बिहार की मिथ्या राजनीति

आजकल समाचारों मैं
राज ठाकरे द्वारा दिए गए बयानों की भरमार है . सवाल उठता है क्या अपने खेत्र के लोगो के बारे में सोचना ग़लत है? और बिहारियों की पैविं के लिए आए भी तो कौन : लालू प्रासद यादव .

समय की विडंबना ही तो है की यह वी लालू प्रसाद है जिन्होंने अपने 15 वर्षीय काय्याकाल में बिहार को सबसे पिछरे राज्य स्थापित कर दियाक्या यह सच नही है की उन्होंने केन्द्र सरकार से राज्य के विकास के लिए मिले धन को खर्च तक नही किया. क्या यह सच नही है की शिॅक्षा के नाम पर कोई प्रगति नही हुई है . उल्टा कई शिक्चाको को वेतन तक नही मिला . घोटालो की चर्चा करना ही बेकार है.
रबरी देवी को मुख्यमंत्री बनाके उन्होंने अपनी कुर्सी तो बचायी पर बिहार का क्या उद्धार किया ?
क्या रबरी देवी बिहार जैसे राज्य का बागडोर सँभालने के लायक थी?
यह हमारे नैतिक पतन की ही पराकास्था है की राजनैतिक विरोधियो ने यह सब कुछ होने दिया. हमारे होनहार आईएस ओफ्फिसर्स ने भी कोई आवाज नही उठाई. लालू समर्थको का क्या कहना : उन्होंने सब कुछ आँख मूंदकर स्वीकार किया. पूरी दुनिया में हम हास्यके पर्याय बन गए पर कुछ लोगो का स्वार्थ सिद्ध हुआ और कुछ लोगो की नपुंसकता सिध्ध हो गई.
आज वही लालू को क्या हक़ है की वो बिहारियों के लिए कुछ बोले?

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